“शहर में रहो, मगर शोर में नहीं…”
शहर में रहो, मगर शोर में नहीं,
भीड़ के बीच रहकर भी खुद से दूर नहीं कभी।
ऊँची इमारतों की छाया में जीओ,
पर अपने आकाश को मत खोओ कहीं।
सिग्नलों की भाषा समझो सही,
पर दिल की आवाज़ को ख़ामोश होने न दो कभी।
तेज़ रफ़्तार में चलो ज़रूर,
मगर ठहरना भी सीखो, यही है दस्तूर।
कैफ़े की रोशनी, स्क्रीन का उजाला,
सब है ज़रूरी—पर सीमित सही।
हर नोटिफ़िकेशन पर मत डोलो,
कुछ ख़ामोशी भी है ज़िंदगी की लय सही।
शहर सिखाता है सपने बुनना,
मुक़ाबला, मेहनत, आगे बढ़ना।
पर याद रहे—जीत उसी की है,
जो भीतर से भी सीख सके मुस्कुराना।
तो शहर में रहो, मगर शोर में नहीं,
अपने भीतर का घर बचाए रखो कहीं।
भीड़ में भी एकांत रच लो तुम,
यही है शहरी जीवन की सच्ची तमीज़ यहीं।

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