एकांत, मौन और आशा का त्रिकोण
रात से प्रश्न करता हूँ—
क्या तुम शून्य हो
या शून्य की साधना?
मेरे प्रश्न
अँधेरे में घुल जाते हैं,
उत्तर नहीं बन पाते।
रात उत्तर नहीं देती।
वह मुझे धारण करती है।
मेरे भीतर
जो डर काँपता है
जो प्रतीक्षा थकती है
जो आशा अभी जन्मी नहीं—
रात
उन सबके ऊपर,
न स्याही,
न कागज,
न आवाज़,
बस उँगलियों की ऊष्मा से
एक ही मंत्र लिखती है—
सुबह।

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